काशी में कुछ नाम ऐसे हैं जो पद, प्रचार या प्रोटोकॉल से नहीं, बल्कि अपने कर्म से पहचाने जाते हैं। इन्हीं में एक नाम है पद्मश्री डॉ. तपन कुमार लहरी—एक ऐसे चिकित्सक, जिनके लिए मरीज “केस” नहीं, इंसान होते हैं।
कहते हैं, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वाराणसी आए थे और शहर की प्रतिष्ठित हस्तियों से भेंट का कार्यक्रम बना, तब डॉ. टी.के. लहरी का नाम भी सूची में था। अधिकारी उनसे मिलने की अनुमति लेने पहुंचे, लेकिन जवाब ने सभी को चौंका दिया।
डॉ. लहरी ने साफ शब्दों में कहा—
“मुझे मिलना है तो ओपीडी में आइए। मैं मरीजों के बीच मिलता हूं, घर पर नहीं।”
इसके बाद प्रस्तावित मुलाकात टल गई। वजह बताई गई कि वीवीआईपी मूवमेंट से अस्पताल की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। लेकिन बनारस जानता है—अगर मुख्यमंत्री ओपीडी में पहुंच भी जाते, तो डॉ. लहरी उन्हें भी सामान्य मरीजों की तरह ही देखते।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ। इससे पहले देश के प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर को भी उन्होंने यही संदेश दिया था—डॉक्टर का धर्म सत्ता से नहीं, सेवा से जुड़ा होता है।
जहां वेतन पीछे रह गया, सेवा आगे बढ़ गई
डॉ. तपन कुमार लहरी का जीवन आधुनिक चिकित्सा जगत के लिए एक आईना है। 1994 से उन्होंने अपनी पूरी तनख्वाह गरीब मरीजों के इलाज के लिए दान कर दी। सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन में से भी वे केवल उतना ही रखते हैं, जिससे साधारण जीवन चल सके। शेष राशि आज भी बीएचयू कोष में जमा होती है।
दिखावा उनके जीवन का हिस्सा कभी नहीं रहा। न महंगी गाड़ी, न निजी अस्पताल, न सुविधाओं की चाह। बनारस की सड़कों पर आज भी लोग उन्हें पैदल चलते देख लेते हैं—एक हाथ में पुराना बैग, दूसरे में काली छतरी।
यहां तक कि बीएचयू के बीमार कुलपति को घर जाकर देखने से भी उन्होंने इनकार कर दिया था। उनका सिद्धांत सीधा है—मरीज डॉक्टर के पास आता है, डॉक्टर दरबार नहीं लगाता।
पद्मश्री मिला, पर जीवन वही रहा
अमेरिका से पढ़ाई कर लौटे डॉ. लहरी ने चाहा होता तो विदेश में करोड़ों कमा सकते थे। लेकिन उन्होंने भारत के गरीब को चुना। 1974 में महज ₹250 के वेतन पर बीएचयू में लेक्चरर बने और यहीं से सेवा का सफर शुरू हुआ।
1997 में जब उनका वेतन एक लाख से ऊपर पहुंचा, तब भी उन्होंने वेतन लेना बंद कर दिया। रिटायरमेंट पर मिला पूरा पीएफ बीएचयू को सौंप दिया। गरीब मरीजों की सेवा ही उनका एकमात्र उद्देश्य रहा। इसी सेवा के लिए भारत सरकार ने 2016 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
आज भी वही दिनचर्या
सुबह छह बजे अस्पताल, घंटों ओपीडी, फिर शाम को दोबारा सेवा—बिना थके, बिना शिकायत। न प्रचार, न अपेक्षा।
जब इलाज मुनाफा बनता जा रहा है, जब अस्पतालों में पहले बिल और बाद में इंसान देखा जाता है, ऐसे समय में डॉ. तपन कुमार लहरी सिर्फ एक डॉक्टर नहीं—एक जीवित आदर्श हैं।
वे याद दिलाते हैं कि
डिग्री से बड़ा कर्तव्य होता है,
और पद से बड़ा पेशा।
काशी की धरती को ऐसे व्यक्तित्व पर गर्व है।
नमन है उस चिकित्सक को,
जिसके लिए इंसानियत ही सबसे बड़ा इलाज है।













