ट्रैफिक जाम ने रोकी छात्राओं की किस्मत, परीक्षा केंद्र के बाहर मचा हाहाकार

बेतिया। शहर के एक परीक्षा केंद्र के बाहर उस समय मार्मिक दृश्य देखने को मिला जब कई छात्राएं ट्रैफिक जाम में फंसकर देर से पहुंचीं और गेट पर खड़े होकर अंदर जाने की गुहार लगाती रहीं। उनके आंसू, बेचैनी और टूटती उम्मीदों ने पूरे माहौल को भावुक बना दिया। मामला सिर्फ कुछ मिनट की देरी का नहीं था, बल्कि उन सपनों का था जो सालों की मेहनत के बाद इसी परीक्षा पर टिके थे।

बताया जा रहा है कि सुबह से ही शहर के मुख्य मार्गों पर भारी जाम की स्थिति बनी हुई थी। इसी जाम में फंसी तीन-चार छात्राएं किसी तरह परीक्षा केंद्र तक पहुंचीं, लेकिन तब तक समय सीमा समाप्त हो चुकी थी। गेट बंद हो चुका था और प्रशासनिक नियमों का हवाला देते हुए उन्हें अंदर प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई। छात्राएं गेट पर खड़ी होकर बार-बार विनती करती रहीं—“हमें अंदर जाने दीजिए, हमारी जिंदगी का सवाल है”—लेकिन उनकी आवाज लोहे के गेट से टकराकर लौटती रही।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार छात्राएं बदहवास हालत में थीं। किसी की आंखों में आंसू थे तो कोई घबराहट में लगातार अपनी एडमिट कार्ड दिखाकर अधिकारियों से निवेदन कर रही थी। वहां मौजूद अभिभावक भी प्रशासन से नरमी बरतने की अपील करते नजर आए, लेकिन परीक्षा नियमों का हवाला देते हुए उन्हें प्रवेश नहीं दिया गया। यह दृश्य देखकर आसपास खड़े लोग भी भावुक हो गए और अव्यवस्था को लेकर सवाल उठाने लगे।

स्थानीय लोगों का कहना है कि परीक्षा जैसे महत्वपूर्ण दिन पर ट्रैफिक व्यवस्था बेहतर होनी चाहिए थी। कई अभिभावकों ने आरोप लगाया कि शहर में जाम की समस्या पहले से ही गंभीर है, इसके बावजूद कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई। नतीजा यह हुआ कि जिन छात्राओं ने साल भर मेहनत की, वे कुछ मिनट की देरी के कारण परीक्षा से वंचित हो गईं।

इस घटना ने शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक समन्वय पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह सिर्फ संयोग था या व्यवस्थागत लापरवाही का परिणाम—यह चर्चा का विषय बन गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन छात्राओं को दोबारा मौका मिलेगा या फिर यह दिन उनके जीवन की सबसे कड़वी याद बनकर रह जाएगा। शहर में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश और सहानुभूति दोनों का माहौल देखा जा रहा है, जबकि छात्राओं के परिवार न्याय और राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

ब्यूरो प्रमुख- ​बेतिया

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