चंदौली। डीडीयू जंक्शन पर अवैध वेंडरिंग की जड़ें अब इतनी गहरी हो चुकी हैं कि सांसदों द्वारा संसद में मुद्दा उठाने के बावजूद भी इन गतिविधियों पर लगाम नहीं लग पा रही है। सूत्रों के अनुसार, रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और कमर्शियल विभाग के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से यह गोरखधंधा खुलेआम फल-फूल रहा है।
वेंडरों के लाइसेंस के नाम पर जारी खेल
रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को खाने-पीने की सुविधाएं देने के नाम पर फूड प्लाजा और जन आहार केंद्रों को लाइसेंस दिए जाते हैं। पर हकीकत यह है कि लाइसेंस पर सिर्फ चार से छह वेंडरों के नाम पंजीकृत हैं, जबकि ज़मीन पर लगभग 15–18 वेंडर अवैध रूप से स्टॉल और टेबल लगाकर सामान बेचते नजर आते हैं।
ऊपर से देखने पर ये वेंडिंग टेबल सामान्य लग सकते हैं, लेकिन इनकी आड़ में बासी भोजन, बिना पैकिंग डेट और बिना स्वच्छता के मानकों के भोजन यात्रियों को बेचा जा रहा है। इन भोजन पैकेट्स पर न तो मैन्युफैक्चरिंग डेट होती है, न एक्सपायरी डेट, और न ही भोजन के बनने का समय। इससे यात्रियों की सेहत के साथ सीधा खिलवाड़ हो रहा है।
साठगांठ से चल रहा है अवैध धंधा
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, चर्चित ठेकेदार हर महीने आरपीएफ, कामर्शियल विभाग और आईआरसीटीसी के अधिकारियों तक एक “निश्चित रकम” पहुंचाता है, ताकि यह अवैध वेंडरिंग निर्बाध रूप से चलती रहे। इसका सबसे बड़ा नुकसान भारतीय रेलवे को आर्थिक रूप से होता है, क्योंकि अधिकतर वेंडर बिना किसी लाइसेंस शुल्क के खुलेआम व्यापार कर रहे हैं। इससे रेलवे को हर महीने लाखों रुपये की राजस्व हानि हो रही है।
यात्रियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर मंडरा रहा खतरा
सवाल उठता है कि जब यात्रियों को गंदा, बासी और बिना प्रमाणित भोजन दिया जाएगा, तो रेल यात्रा का अनुभव कैसे सुरक्षित और संतोषजनक रह पाएगा? इसके अतिरिक्त, किसी भी आकस्मिक स्थिति (फूड पॉयजनिंग, फूड एलर्जी आदि) में जिम्मेदारी तय करना नामुमकिन हो जाता है, क्योंकि फूड पैकेट पर कोई जानकारी ही दर्ज नहीं होती।
मीडिया की आवाज दबाई जा रही है?
स्थानीय मीडिया में बार-बार खबरें चलने के बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। जानकारों का कहना है कि यह सिस्टम “नीचे से ऊपर तक सेट” है, इसलिए खबरें भी “नक्कारखाने में तूती की आवाज” बनकर रह जाती हैं।
संवाददाता- राहुल सिंह













