वाराणसी। भारत ने गुरुवार को स्वच्छ ऊर्जा परिवहन के क्षेत्र में एक बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया, जब केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने नमो घाट से देश के पहले पूरी तरह स्वदेशी हाइड्रोजन फ्यूल सेल चालित यात्री जलयान को आधिकारिक रूप से शुरू किया। इसके साथ ही वाराणसी दुनिया के चुनिंदा शहरों की उस सूची में शामिल हो गया है, जहां हाइड्रोजन-संचालित यात्री नौका सार्वजनिक सेवा में काम कर रही है।
देश में पहली बार लॉन्च हुआ यह 24 मीटर लंबा कैटामरान जलयान न सिर्फ तकनीक के लिहाज से अत्याधुनिक है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी एक बड़ी उपलब्धि है। पूरी तरह हाइड्रोजन फ्यूल सेल से चलने वाली इस नौका का उत्सर्जन शून्य है—यानी न धुआं, न कार्बन, न शोर। डीजल इंजन का प्रयोग बिल्कुल नहीं, और संचालन इतना शांत कि नाव चल रही है या रुकी है—फर्क महसूस करना मुश्किल।
एफसीवी पायलट-01 नाम की यह एसी नौका 50 यात्रियों को आरामदायक यात्रा उपलब्ध कराती है। एक बार हाइड्रोजन भरने पर यह लगभग आठ घंटे निरंतर सफर कर सकती है और इसकी स्पीड 7–9 नॉट (करीब 13 से 17 किमी/घंटा) तक रहती है। इसे कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने ‘मेक इन इंडिया’ के तहत पूरी तरह देशी तकनीक से तैयार किया है, जबकि इसका संचालन आईडब्ल्यूएआई (भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण) करेगी।
जहाज में लो-टेम्परेचर प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन फ्यूल सेल, बैटरी पैक और सोलर एनर्जी—तीनों का हाइब्रिड सेटअप लगाया गया है। सुरक्षा और क्वालिटी मानकों को देखते हुए इंडियन रजिस्टर ऑफ शिपिंग ने इसे औपचारिक प्रमाणन दिया है।
उद्घाटन कार्यक्रम में मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा,
“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने दिखा दिया है कि भविष्य का ईको-फ्रेंडली परिवहन केवल कल्पना नहीं, बल्कि हमारी वास्तविक क्षमता है। गंगा पर हाइड्रोजन से चलने वाला यह जलयान आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और क्लीन गंगा—तीनों विज़न्स को वास्तविक रूप दे रहा है।”
इस मौके पर उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दयाशंकर सिंह, रविंद्र जायसवाल, डॉ. दया शंकर मिश्रा ‘दयालू’, वाराणसी के महापौर अशोक कुमार तिवारी, आईडब्ल्यूएआई के चेयरमैन सुनील पालीवाल, मंत्रालय के सचिव टी.के. विजय कुमार सहित कई विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे।
आईडब्ल्यूएआई के अनुसार हाइड्रोजन-संचालित जलयान परियोजना मेरीटाइम इंडिया विज़न 2030, अमृत काल विज़न 2047, तथा 2070 के नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य की दिशा में एक निर्णायक कदम है। वाराणसी में इस तकनीक की शुरुआत देश के जलमार्गों में स्वच्छ ऊर्जा आधारित ट्रांसपोर्ट की नई संभावनाओं का रास्ता खोलेगी।













