बीना/सोनभद्र। एनसीएल (नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) की बीना परियोजना एक बार फिर विवादों में घिर गई है। परियोजना में ओबी (ओवर बर्डन) का कार्य कर रही निजी कंपनी राधा चेन्नई इंजीनियरिंग वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड पर मूल भू-विस्थापित मजदूरों को जानबूझकर रोजगार से वंचित रखने का गंभीर आरोप लगा है। इस मुद्दे को लेकर प्रभावित परिवारों में जबरदस्त रोष व्याप्त है और अब यह मामला आंदोलन की शक्ल लेने की कगार पर पहुंच चुका है।
ग्राम घरसडी, पोस्ट योगीचौरा, तहसील दुद्धी, जिला सोनभद्र निवासी बबूल प्रसाद दुबे पुत्र श्याम कार्तिक दुबे ने खुलकर आरोप लगाया है कि उनकी पुश्तैनी जमीन और आवास एनसीएल बीना परियोजना के विस्तार के लिए अधिग्रहित किए गए, लेकिन बदले में न तो उन्हें पूर्ण पुनर्वास मिला और न ही रोजगार की गारंटी का पालन किया गया।
पीड़ित के अनुसार, उनके बाबा स्व. नवाब सम दुबे पुत्र स्व. विश्वंभर दुबे के नाम दर्ज करीब 2.94 एकड़ भूमि और आवासीय भवन को एनसीएल बीना परियोजना द्वारा विभिन्न अधिसूचनाओं के तहत अधिग्रहित किया गया था। अधिग्रहण के समय प्रशासन और परियोजना प्रबंधन द्वारा यह स्पष्ट आश्वासन दिया गया था कि प्रभावित परिवार को कृषक भूमि, आवासीय प्लॉट और रोजगार प्रदान किया जाएगा। लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद यह आश्वासन कागजों से बाहर नहीं निकल सका।
बबूल प्रसाद दुबे का कहना है कि वह बीते 15 वर्षों से एनसीएल की पूर्व ओबी कंपनियों में कार्य कर अपने परिवार का भरण-पोषण करता रहा है। स्थानीय होने के साथ-साथ वह मूल भू-विस्थापित भी है, इसके बावजूद वर्तमान में कार्यरत कंपनी द्वारा उसे अचानक काम से बाहर कर दिया गया। इससे उसका पूरा परिवार आर्थिक संकट में फंस गया है।
पीड़ित ने बताया कि इस गंभीर विषय को लेकर उसने कई बार एनसीएल बीना प्रबंधन, स्थानीय प्रशासन और उप जिलाधिकारी दुद्धी से संपर्क किया। उप जिलाधिकारी द्वारा उसके बायोडाटा पर हस्ताक्षर कर रोजगार दिलाने का भरोसा भी दिया गया, लेकिन आश्वासन के बावजूद आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। हर बार उसे केवल तारीख और आश्वासन ही मिला।
सबसे अहम बात यह है कि पीड़ित ने अपने आरोपों के समर्थन में सरकारी दस्तावेजों का भी हवाला दिया है। उसने बताया कि 18 फरवरी 2022 को श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना तथा 10 जुलाई 2006 को एनसीएल मुख्यालय द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि किसी भी परियोजना में कम से कम 80 प्रतिशत मूल भू-विस्थापितों को रोजगार देना अनिवार्य है। इसके बावजूद, कंपनी द्वारा इन नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है।
आरोप यह भी है कि नियमों को दरकिनार कर बाहरी लोगों से कथित रूप से धन लेकर उन्हें कार्य पर रखा जा रहा है, जबकि जिनकी जमीन और घर परियोजना में चले गए, वे आज रोजगार के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। यह स्थिति न केवल कानून और नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
लगातार अनसुनी और उपेक्षा से आहत होकर बबूल प्रसाद दुबे ने अब कड़ा कदम उठाने का ऐलान किया है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि एक सप्ताह के भीतर उन्हें रोजगार नहीं दिया गया, तो वह 19 जनवरी 2026 से एनसीएल बीना परियोजना के मुख्य महाप्रबंधक कार्यालय के मुख्य द्वार पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल, सत्याग्रह और आमरण अनशन शुरू करेंगे। उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान यदि उनके साथ कोई अप्रिय घटना होती है, तो इसकी पूर्ण जिम्मेदारी एनसीएल प्रबंधन और भारत सरकार की होगी।
यह मामला अब केवल एक व्यक्ति या एक परिवार का नहीं रह गया है। क्षेत्र में दर्जनों मूल भू-विस्थापित परिवार ऐसे हैं, जो परियोजना के नाम पर अपनी जमीन, घर और आजीविका गंवा चुके हैं, लेकिन बदले में उन्हें न तो स्थायी पुनर्वास मिला और न ही सम्मानजनक रोजगार। यही वजह है कि इस मुद्दे को लेकर इलाके में व्यापक चर्चा और आक्रोश का माहौल है।
एनसीएल बीना परियोजना, जो ऊर्जा उत्पादन में अहम भूमिका निभाती है, यदि अपने ही विस्थापितों के साथ न्याय नहीं कर पा रही है, तो यह व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। अब देखना यह है कि प्रशासन और प्रबंधन इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेते हैं, या फिर एक मूल भू-विस्थापित को अपने अधिकारों के लिए भूख हड़ताल और आमरण अनशन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।













