वाराणसी। काशी की पावन धरा एक बार फिर भारतीय संस्कृति की वैश्विक स्वीकृति की साक्षी बनी, जब रूस के व्यापारी दंपत्ति कोंस्टेंटिन मरिंग और मरीना ने दशाश्वमेध घाट पर वैदिक परंपराओं के अनुसार विवाह रचाया। गंगा की लहरों, हवन कुंड की अग्नि और मंत्रोच्चार के बीच दोनों ने सात फेरे लेकर सात जन्मों तक साथ निभाने का संकल्प लिया।
बुधवार को हुए इस विशेष विवाह संस्कार में विदेशी जोड़ा पूरी तरह भारतीय रंग में रंगा नजर आया। पारंपरिक परिधान, वैदिक विधि-विधान और शास्त्रोक्त मंत्रों के साथ पंडितों ने विवाह संपन्न कराया। अग्नि को साक्षी मानकर कोंस्टेंटिन ने मरीना की मांग में सिंदूर भरा—यह दृश्य घाट पर मौजूद श्रद्धालुओं के लिए भी भावुक और आकर्षण का केंद्र बन गया।
दंपत्ति का कहना है कि उन्हें भगवान शिव और गंगा मईया के प्रति गहरी आस्था है। भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिकता और पारिवारिक मूल्यों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने विवाह के लिए काशी को ही चुना। “सात फेरों का अर्थ समझकर हमने जीवनभर साथ निभाने का निर्णय लिया,” दंपत्ति ने भावुक स्वर में कहा।
दशाश्वमेध घाट, जहां प्रतिदिन गंगा आरती से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है, वहां यह विवाह एक सांस्कृतिक संदेश बनकर उभरा। यह आयोजन दर्शाता है कि काशी अब केवल मोक्ष की नगरी नहीं, बल्कि संस्कृतियों के संगम और वैश्विक आकर्षण का केंद्र भी बन चुकी है। विदेशी जोड़ों का यहां वैदिक विवाह करना भारतीय परंपराओं की बढ़ती विश्वव्यापी स्वीकार्यता का जीवंत उदाहरण है।









