चंदौली। हर वर्ष की तरह इस बार भी 16 अगस्त 1942 के ऐतिहासिक थाना गोलीकांड की स्मृति में धानापुर कस्बे में शहीद दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। लेकिन इस बार का आयोजन केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जिले की राजनीति में हलचल मचाने वाला बन गया। वजह बनी चंदौली के सपा सांसद वीरेंद्र सिंह का कार्यक्रम से बहिष्कार। सांसद ने शहीदों की अनदेखी और राजनीतिक उपेक्षा का गंभीर आरोप प्रशासन और आयोजक समिति पर लगाया।
सांसद वीरेंद्र सिंह का आरोप: “पीडीए शहीदों की उपेक्षा बर्दाश्त नहीं”
सांसद वीरेंद्र सिंह ने कार्यक्रम से दूरी बनाते हुए कहा कि उन्होंने अपनी सांसद निधि से दस लाख रुपये की राशि जिलाधिकारी को मूर्ति स्थापना के लिए दी थी, लेकिन समिति ने अब तक वह मूर्ति नहीं लगवाई। उनका आरोप था कि समिति ने बीजेपी नेताओं के दबाव में आकर पिछड़े, दलित और आदिवासी (पीडीए) वर्ग के शहीदों की प्रतिमा नहीं लगवाई, जो कि गंभीर उपेक्षा का मामला है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज़ादी की लड़ाई में पीडीए समाज के वीर सपूतों ने भी बलिदान दिया, लेकिन उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया जा रहा। कार्यक्रम स्थल पर केवल एक जाति के तीन शहीदों की प्रतिमाएं लगाई गई हैं, जबकि अन्य समाजों के शहीदों की उपेक्षा की गई है।
धानापुर थाना गोलीकांड: आज़ादी की लड़ाई का अनदेखा अध्याय
16 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान धानापुर क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानी थाने पर तिरंगा फहराने के लिए पहुंचे थे। अंग्रेजी पुलिस ने उन पर गोली चला दी, जिसमें कई क्रांतिकारी मौके पर ही शहीद हो गए। यह घटना पूर्वांचल में ब्रिटिश शासन के खिलाफ सबसे प्रमुख घटनाओं में मानी जाती है। तभी से हर वर्ष इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।
श्रद्धांजलि कार्यक्रम की झलक
शनिवार को आयोजित कार्यक्रम में जिले भर से जनप्रतिनिधि, अधिकारी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजन और बड़ी संख्या में आम जनता शामिल हुई।
कार्यक्रम की प्रमुख गतिविधियाँ इस प्रकार रहीं:
- शहीद पार्क में प्रतिमाओं पर माल्यार्पण
- कलेक्ट्रेट और धानापुर थाना परिसर में श्रद्धांजलि सभाएं
- क्रांतिकारियों की याद में संगोष्ठियों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन
हालांकि सांसद वीरेंद्र सिंह ने मंचीय कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन उन्होंने बाद में शहीद पार्क पहुंचकर सभी शहीदों को पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।
सियासी प्रतिक्रिया और संभावित प्रभाव
सांसद के बहिष्कार के बाद स्थानीय राजनीति में बहस तेज हो गई है।
कुछ लोगों का कहना है कि यह कदम साहसी है और वर्षों से उपेक्षित समाज के शहीदों को न्याय दिलाने की दिशा में उठाया गया है। वहीं, कुछ ने इसे राजनीतिक नौटंकी करार दिया।
विशेषज्ञों की मानें तो यह मुद्दा आगामी चुनावों में भी उठ सकता है और पीडीए समाज के सम्मान से जुड़ा बड़ा सवाल बन सकता है।
निष्कर्ष: श्रद्धांजलि में राजनीति या न्याय की मांग?
शहीद दिवस का अवसर देशभक्ति और एकता का प्रतीक होता है। लेकिन अगर उस दिन भी किसी वर्ग के शहीदों के साथ भेदभाव महसूस किया जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या हम वास्तव में सभी शहीदों को समान सम्मान दे रहे हैं?
क्या यह बहिष्कार राजनीति से प्रेरित था या सच्ची संवेदनाओं की अभिव्यक्ति?
इन सवालों का उत्तर समय देगा, लेकिन इतना निश्चित है कि यह घटना अब केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एक बड़ी बहस की नींव रख चुकी है।
विशेष संवाददाता- गनपत राय













