वाराणसी। यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन बिल, 2026 को लेकर देशभर में विरोध के स्वर लगातार तेज होते जा रहे हैं। इस बार सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के एक बड़े वर्ग ने खुलकर इस बिल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। विरोध कर रहे छात्रों का आरोप है कि यह प्रस्तावित कानून एकपक्षीय है और इससे उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता स्थापित होने के बजाय अविश्वास और सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिलेगा।
छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि बिल की मूल भावना में यह संदेश निहित है कि कैंपस में होने वाले भेदभाव के लिए केवल सामान्य वर्ग के छात्र ही जिम्मेदार हैं, जो न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है बल्कि एक पूरे वर्ग को मानसिक रूप से कठघरे में खड़ा करने जैसा है। उनका कहना है कि इस तरह की धारणा से सामान्य वर्ग के छात्रों में असुरक्षा, भय और अपराधबोध की भावना पैदा होगी, जिससे शिक्षा का स्वस्थ वातावरण प्रभावित होगा।
विरोध करने वालों का तर्क है कि विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान अब तक योग्यता, प्रतिभा और समान अवसर के सिद्धांतों पर आधारित रहे हैं। लेकिन यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन बिल समानता की परिभाषा को एकतरफा रूप से प्रस्तुत करता है, जिससे merit-based सिस्टम पर भी सवाल खड़े होते हैं। शिक्षकों का कहना है कि इससे छात्र-छात्राओं के बीच स्वाभाविक संवाद और विश्वास कमजोर हो सकता है।
प्रदर्शनकारियों ने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 में पहले से ही भेदभाव और उत्पीड़न से जुड़े मामलों के लिए पर्याप्त कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। ऐसे में अलग से ‘समता समिति’ गठित करने की आवश्यकता पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। उनका आरोप है कि प्रस्तावित समता समिति में सामान्य वर्ग का कोई प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं है और झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के खिलाफ कोई स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं रखा गया है, जिससे एकतरफा कार्रवाई की आशंका बढ़ जाती है।
छात्र संगठनों का कहना है कि यदि यह बिल वर्तमान स्वरूप में लागू होता है तो कैंपस में अविश्वास, टकराव और सामाजिक दूरी की भावना और गहरी हो सकती है। इसका सीधा असर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई के माहौल और आपसी सौहार्द पर पड़ेगा। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि वे समानता के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन समानता का अर्थ सभी वर्गों के लिए न्यायपूर्ण और संतुलित होना चाहिए।
इन सभी बिंदुओं को सामने रखते हुए छात्रों और शिक्षकों ने यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन बिल, 2026 को तत्काल वापस लेने या इसमें व्यापक संशोधन करने की मांग की है। उनका कहना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों को सामाजिक समरसता, विश्वास और समान अवसर का केंद्र बनाए रखने के लिए किसी भी कानून का निष्पक्ष और सर्वसमावेशी होना अनिवार्य है।













