वाराणसी। सेवा, करुणा और त्याग की भावना से स्थापित संस्थानों से समाज को हमेशा उम्मीद रहती है कि वहां पीड़ा का समाधान मिलेगा, न कि आर्थिक बोझ का अहसास। लेकिन शहर में स्थित रामकृष्ण मिशन सेवा आश्रम को लेकर हाल के दिनों में कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप लग रहे हैं कि यहां इलाज, जांच और दवाओं के शुल्क इस तरह तय किए जा रहे हैं, मानो यह पूरी तरह व्यावसायिक मॉडल पर संचालित अस्पताल हो, जबकि इसकी पहचान लंबे समय से सेवा और परोपकार से जुड़ी रही है।
सूत्रों का दावा है कि मरीजों को आवश्यक जांच के नाम पर निजी संस्थानों की ओर भेजा जा रहा है, जहां खर्च काफी अधिक बताया जाता है। इससे गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों पर आर्थिक दबाव बढ़ने की बात कही जा रही है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि दान और धर्म के नाम पर संचालित संस्थान से अपेक्षा अलग होती है, लेकिन यहां कई बार पहले भुगतान और बाद में उपचार जैसी स्थिति महसूस होती है, जिससे सेवा की मूल भावना पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
शहर के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि संस्थान आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों के आधार पर शुल्क ले रहा है, तो यह पारदर्शी ढंग से स्पष्ट किया जाना चाहिए कि सेवा और शुल्क के बीच संतुलन कैसे बनाया जा रहा है। उनका तर्क है कि “सेवा आश्रम” शब्द अपने आप में भरोसे और सहारे का प्रतीक है, ऐसे में यदि व्यवस्था पूरी तरह शुल्क आधारित हो जाए तो आमजन में भ्रम की स्थिति बनती है।
कुछ शिकायतों में यह भी आरोप लगाया गया है कि मरीजों के साथ व्यवहार और प्राथमिकता को लेकर असमानता की शिकायतें सामने आई हैं, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। लोगों का कहना है कि यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो संबंधित ट्रस्ट और प्रशासन को निष्पक्ष जांच करानी चाहिए, ताकि सेवा संस्थानों की विश्वसनीयता बनी रहे और जरूरतमंदों का भरोसा कमजोर न पड़े।









