चंदौली। समाजवादी पार्टी के सांसद विरेंद्र सिंह एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। हाल ही में उन्होंने डीडीयू मंडल स्थित लोको हॉस्पिटल का निरीक्षण किया था, जहां बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं, दवाओं की कमी और गंदगी जैसी गंभीर खामियां उजागर की गईं थीं। इस निरीक्षण को जनहित की पहल के रूप में प्रचारित किया गया, लेकिन सूत्रों के अनुसार यह कदम केवल राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति थी।
दरअसल, सांसद के करीबी कुछ निजी अस्पतालों को रेलवे कर्मचारियों के इलाज के लिए रेफर करने का दबाव बनाए जाने की बात सामने आई है। बावजूद इसके, लोको अस्पताल की हालत निरीक्षण के बाद भी जस की तस बनी हुई है — न सफाई में सुधार हुआ और न ही सुविधाओं में कोई ठोस परिवर्तन देखा गया।
सुरक्षा एजेंसियों पर गंभीर आरोप
सांसद विरेंद्र सिंह ने अब एक नया मोर्चा खोलते हुए रेल मंत्री को ज्ञापन सौंपा है, जिसमें RPF और GRP पर मादक पदार्थों की तस्करी, हवाला कारोबार और अवैध गतिविधियों में संलिप्तता के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
लेकिन हकीकत यह है कि इन एजेंसियों ने बीते एक महीने में उल्लेखनीय कार्रवाई की है:
- शराब तस्करों पर मुकदमे दर्ज किए गए।
- अवैध रूप से संचालित स्टैंड्स को हटाया गया।
- हवाला में लिप्त लाखों रुपये जब्त किए गए।
इन सबके बावजूद सांसद द्वारा इन कार्यवाहियों की अनदेखी करना कई सवाल खड़े करता है।

क्या है सच्चाई?
सूत्रों का दावा है कि सांसद के करीबी लोगों द्वारा ही रेलवे परिसर में अवैध स्टैंड संचालित किया जा रहा था। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या यह जनहित की कार्रवाई थी या केवल राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश?
लोकहित या निजी स्वार्थ?
यह पहली बार नहीं है जब सांसद जी किसी मुद्दे पर सक्रिय दिखे हों लेकिन परिणामों की पारदर्शिता और ज़िम्मेदारी से दूरी बना ली हो। लोको हॉस्पिटल की स्थिति और अब सुरक्षा एजेंसियों पर आरोप — दोनों घटनाएं इसी रणनीति की ओर संकेत करती हैं: पहले शोर, फिर साइलेंस।
विशेष संवाददाता- गनपत राय













