गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद का दक्षिणांचल क्षेत्र—खजनी, सिकरीगंज, उरुवा बाजार, डेईडिहा, बनवारपार, गोपालपुर, गोला, धुरियापार, कुई बाजार, बेलघाट, शंकरपुर, कुरी बाजार, रापतपुर, भभया, सिसवा सोनबरसा और कटसहरा—पिछले लगभग तीन दशकों से विकास की दौड़ में पीछे छूटता चला गया है। हैरानी की बात यह है कि यह क्षेत्र दो संसदीय और तीन-तीन विधानसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है, इसके बावजूद बुनियादी सुविधाओं के लिए आज भी संघर्ष कर रहा है।
दक्षिणांचल की सबसे बड़ी और पीड़ादायक समस्या सरकारी परिवहन व्यवस्था का अभाव है। लाखों की आबादी वाले इस क्षेत्र में चौबीस घंटे में महज एक रोडवेज बस का संचालन—वह भी बिना तय समय-सारिणी के—सरकारी दावों की पोल खोल देता है। खजनी के किसान रामवृक्ष यादव कहते हैं, “शहर जाने के लिए बस का इंतजार करते-करते आधा दिन निकल जाता है, आखिर में मजबूरी में महंगी प्राइवेट गाड़ी पकड़नी पड़ती है।”
सरकारी बसों की कमी का सीधा फायदा प्राइवेट वाहन चालकों को मिल रहा है। सामान्य दिनों में 40–50 रुपये का किराया, जरूरत के समय 800 से 1000 रुपये तक वसूला जा रहा है। सिकरीगंज की सीता देवी सवाल उठाती हैं, “एक हजार रुपये कमाने में हमें कई दिन लगते हैं, क्या सरकार को इसका एहसास है?” यह मनमानी सिर्फ आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि आम जनता के सम्मान पर भी चोट है।
दक्षिणांचल के लोग किसी विशेष रियायत या बड़े-बड़े वादों की मांग नहीं कर रहे। उनकी जरूरतें बेहद बुनियादी हैं—समय पर शहर पहुंचने की सुविधा, इलाज, पढ़ाई और रोज़गार तक सुरक्षित पहुंच। उरुवा बाजार के रमेश निषाद साफ कहते हैं, “हमें भाषण नहीं, सुविधा चाहिए।” लेकिन हर चुनाव में वादों की बाढ़ के बाद यह इलाका फिर हाशिये पर चला जाता है।
डेईडिहा के मोहन पांडेय तीखा सवाल करते हैं, “क्या हमारी अहमियत सिर्फ वोट डालने के दिन तक ही है?” वहीं गोला और धुरियापार के युवाओं का कहना है कि परिवहन की कमी के कारण नौकरी और शिक्षा के अवसर उनसे छिनते जा रहे हैं, जिससे पलायन मजबूरी बनता जा रहा है।
अब सवाल सीधे प्रदेश सरकार से है—क्या गोरखपुर का दक्षिणांचल प्रदेश का हिस्सा नहीं है? क्या यहां के नागरिक दूसरे दर्जे के माने जाते हैं? यदि नहीं, तो तत्काल रोडवेज बसों की संख्या बढ़ाई जाए, नियमित समय-सारिणी तय हो, रात्रिकालीन सेवाएं शुरू हों और प्राइवेट किराया वसूली पर सख्त नियंत्रण लगाया जाए।
दक्षिणांचल में उबलता यह जनआक्रोश किसी दल का नहीं, बल्कि आम जनता की आवाज़ है। अगर समय रहते सरकार ने ध्यान नहीं दिया, तो यह उपेक्षा आने वाले दिनों में बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकती है। विकास के दावे तभी सच माने जाएंगे, जब आखिरी गांव तक बस पहुंचेगी और आखिरी व्यक्ति तक सुविधा।













