वाराणसी। धर्म और आस्था की नगरी काशी में गुरुवार को भगवान जगन्नाथ की ऐतिहासिक रथयात्रा पूरे धार्मिक उत्साह और पारंपरिक वैभव के साथ शुरू हुई। करीब 226 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के तहत भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देने निकले। रथयात्रा के शुभारंभ के साथ पूरा क्षेत्र “जय जगन्नाथ” के जयघोष से गूंज उठा।
धार्मिक मान्यता है कि रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ तीन दिनों तक भक्तों के बीच विराजमान रहते हैं और सच्चे मन से की गई प्रार्थनाओं को स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि इस पर्व में शामिल होने के लिए दूर-दराज़ से श्रद्धालु काशी पहुंचते हैं।
डोली यात्रा के साथ शुरू हुई परंपरा
रथयात्रा से एक दिन पहले बुधवार की शाम भगवान जगन्नाथ की पारंपरिक डोली यात्रा निकाली गई। डोली में विराजमान भगवान को बेनीराम बगीचा ले जाया गया, जिसे धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान का ससुराल माना जाता है। रात्रि विश्राम के बाद गुरुवार तड़के भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विधि-विधान के साथ रथ पर विराजमान कराया गया।
मंगला आरती और 56 भोग का हुआ आयोजन
सुबह मंगला आरती के साथ मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। दर्शन के लिए सुबह से ही बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी। पूजा-अर्चना के बाद भगवान को पारंपरिक 56 भोग अर्पित किया गया और श्रद्धालुओं ने परिवार की सुख-समृद्धि एवं कल्याण की कामना की।
तीन दिन तक चलेगा धार्मिक आयोजन
मंदिर के पुजारी राधेश्याम पांडेय ने बताया कि रथयात्रा महोत्सव तीन दिनों तक चलेगा। उन्होंने कहा कि इस दौरान भगवान के दर्शन और रथ के दर्शन-पूजन का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि रथ को खींचने वाले श्रद्धालुओं को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
सुरक्षा के व्यापक इंतजाम
रथयात्रा में देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा, यातायात और अन्य व्यवस्थाओं के व्यापक इंतजाम किए हैं। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी लगातार व्यवस्था की निगरानी कर रहे हैं ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
काशी की जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत और आस्था का जीवंत उत्सव है, जो हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।













