लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने जनसुनवाई पोर्टल की शुरुआत आम जनता और प्रशासन के बीच सीधा संवाद स्थापित करने तथा शिकायतों के समयबद्ध और पारदर्शी निस्तारण के उद्देश्य से की थी। लेकिन प्रदेश के कई जिलों से ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि जमीनी स्तर पर इस व्यवस्था का अपेक्षित लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उनकी समस्याओं की निष्पक्ष जांच करने के बजाय कई मामलों में विभागीय अधिकारी केवल औपचारिक रिपोर्ट लगाकर शिकायतों का निस्तारण दिखा देते हैं। जबकि वास्तविकता में संबंधित समस्या जस की तस बनी रहती है। इससे सरकारी रिकॉर्ड में शिकायतें समाप्त दिखाई देती हैं, लेकिन जनता की परेशानियां खत्म नहीं होतीं।
लोगों का कहना है कि यदि शिकायतकर्ता स्वयं समाधान से संतुष्ट नहीं है, तो शिकायत को बंद करने का आधार क्या है? यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जनसुनवाई पोर्टल का उद्देश्य केवल लंबित मामलों की संख्या कम दिखाना है या वास्तव में लोगों को न्याय और राहत पहुंचाना है।
प्रदेश के विभिन्न जिलों से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां शिकायतकर्ता बार-बार एक ही समस्या को लेकर आवेदन करने के लिए मजबूर हुए हैं। इससे जनसुनवाई व्यवस्था की प्रभावशीलता और जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
लोगों का मानना है कि जनसुनवाई प्रणाली तभी सार्थक होगी, जब शिकायतों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित हो और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। साथ ही शिकायत के निस्तारण से पहले शिकायतकर्ता की संतुष्टि को भी प्राथमिकता दी जाए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लोगों ने अपील की है कि जनसुनवाई पोर्टल पर बंद की गई शिकायतों की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि निस्तारण केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि धरातल पर भी उसका प्रभाव दिखाई दे।
जनता का कहना है कि उन्हें निस्तारित शिकायतों के आंकड़े नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं का वास्तविक और स्थायी समाधान चाहिए। तभी जनसुनवाई व्यवस्था का मूल उद्देश्य पूरा हो सकेगा।













