रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने वाली प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण सम्मान से अलंकृत तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर स्थित एम्स में निधन हो गया। वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थीं और चिकित्सकों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था। उनके निधन के साथ भारतीय लोककला ने अपनी सबसे प्रभावशाली आवाजों में से एक को खो दिया।
तीजन बाई ने पंडवानी गायन को गांव की चौपाल से निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उनकी दमदार आवाज, अभिनय शैली और महाभारत की कथाओं की जीवंत प्रस्तुति ने देश ही नहीं, विदेशों में भी उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई। उन्होंने लोककला को केवल जीवित ही नहीं रखा, बल्कि उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य भी किया।
दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई ने बेहद साधारण परिवार से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाई। शुरुआती दिनों में सामाजिक परंपराओं और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करने के बावजूद उन्होंने अपने कला-साधना का रास्ता नहीं छोड़ा। उस समय महिलाओं द्वारा पंडवानी की कापालिक शैली में प्रस्तुति देना असामान्य माना जाता था, लेकिन उन्होंने इस परंपरा को बदलते हुए अपनी विशिष्ट शैली विकसित की।
करीब छह दशकों के लंबे कला जीवन में उन्होंने भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, जापान, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों में पंडवानी की प्रस्तुति दी। उनकी कला ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई।
भारतीय कला और संस्कृति में उनके योगदान के लिए उन्हें समय-समय पर कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मभूषण और बाद में देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण भी प्रदान किया गया।
तीजन बाई के निधन पर कला, साहित्य, राजनीति और सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोगों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। उनके चाहने वालों का कहना है कि उनकी आवाज भले ही अब खामोश हो गई हो, लेकिन पंडवानी के माध्यम से उन्होंने जो सांस्कृतिक विरासत छोड़ी है, वह आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।













